ख़ुद से गुफ़्तगू (khud se guftagu)

ख़ुद से गुफ़्तगू (Khud se guftagu)


आज बड़े लंबे अरसे बाद ख़ुद से गुफ़्तगू करने जी जुर्रत की,
काफ़ी वक्त गुजर गया था शायद ,मुझे तो अच्छे से याद भी नहीं आंखरी बार ख़ुद से बातें ना जाने कब की थी , सोचा ख़ुद के हाल जान ले,
खुद के हाल जानने की जहमत की तो , "वह बड़ा ही परेशान सा था, वो मुझसे बहुत नाराज था, जब वजह का पता लगाया तो पता चला कि वाकई में वजह हैरान कर देने वाली थी।
शिकायत यह थी कि ख़ुद को खुद से बात करने का वक़्त नही था। वाकई में बहुत दिनों बाद बात करने के लिए वक़्त निकाला था ।
हाल लेने की कोशिश की तो वह दुनिया की इस भीड़ में वो बहुत अकेला नज़र आ रहा था यहाँ  तक कि वह ख़ुद से भी दूर हो गया था, मानो भीड़ से डर कर कही किसी कोने में दुबक के बैठा हो। शायद उसने अकेले रहने की आदत सी डाल ली थी , वरन कभी ऐसे भी दिन थे कि उसे अकेले से घुटन सी होती थी, पर आज वह उसी एकांतपन को अपनी जिंदगी बना लिया था। आह मुझे भी अहसास होने लगा कि वाकई में वक़्त और हालात के साथ हर कोई बदल जाता हैं ,और बेवज़ह लोगो को दोष दिया करते है ।
मैंने उसे मनाने की बहुत सी कोशिश की पर आज उसने मुझे मुड कर तक नही देखा , मेरी एक ना सुनी । शायद उसे यह अहसास हो गया था कि उसे अकेले ही रहना है , और ना किसी से उम्मीद बची हो।
आज उसने मुझसे जरा सी भी बात नही की और ना ही मेरे सवालों के एक भी जवाब दिए।
मैं बहुत देर तक उसकी राह देखता रहा , बहुत इंतजार करता रहा, लेकिन आज मैं ख़ुद हैरान था ,रोज तो मनाने में मान जाता था पर आज नाराजगी बहुत लम्बी लग रही थी , शायद कभी नाराजगी खत्म ना हो  । मैं यूँ ही बैठा रहा सहमा सहमा सा जब कोई भी उम्मीद नजर नही आई तो , मैं उसे उसके ही हाल पर छोड़ आया , और ख़ुद को अकेला कर आया ।"

"सच ही कहा करता था वो वक़्त किसी का नही होता, औऱ मैं भी वक़्त की तरह हूँ।"

कुछ इस कदर ज़माने से दिल्लगी कर बैठे हम,
कि ख़ुद से ही ख़फ़ा हो बैठे हम ।

✍️तेश

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