वो ना समझ ....


ना जाने वो कहा मुझे ढूंढ रहे थे पूरे जहां में , 
उस नासमझ ने अपने दिल मे झाँक के एक बार देखा तक नही।

ना जाने क्या चाहिए था उन्हें जमाने से ,
उस नासमझ ने मुझसे एक बार कुछ कहा तक नहीं ।

यूँ तो जीत लेते है वो हर एक जंग ज़िन्दगी से,
वो नासमझ  दिल के मामले में संभले तक नहीं।

ना जाने कहाँ कहाँ घूम आये थे दुनिया मे,
वो नासमझ जहाँ सुकून मिला वहाँ  रुके तक नहीं।

मंज़िल उनके कदमों में ही थी,
पर उस नासमझ ने कदमों में देखा तक नहीं।

हितेश







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